Guldasta E Shabd

19.00

इसे किताब कहना ठीक नहीं होगा, न ही यह किसी तरीके की कोई कलेक्शन है; जैसा कि इसके नाम से ही ज़ाहिर है, ‘गुलदस्ता-ए-शब्द’, अल्फाजों या शब्दों का एक गुलदस्ता है, जो सानिया सैफ़ी इसे पढ़ने वालों को देना चाहती हैं | गुलदस्ता इसलिए, क्योंकि इसमें लिखा हर अल्फाज़ शायरा के दिल के बहुत करीब हैं | इस गुलदस्ते में जहाँ एक नज़्म भारत के बंटवारे का दर्द बयाँ करती हुई नज़र आती हैं, वहीँ पर इश्क़िया अंदाज़ में कुछ अल्फाज़, अपने महबूब की जुदाई या उसके मेल को शेरों के रूप में खुद को लिखा हुआ पाते है | ये दोनों ही विषय, शायरा के दिल के बहुत करीब हैं क्योंकि उनका मानना है की इंसान का ज़ेहेन बस इश्क़ करना जानता है लेकिन उसके आस-पास की यह दुनिया उसे बंटकर और बांटकर रहना सिखाती है | यही वजह है कि इसका नाम ‘गुलदस्ता-ए-शब्द’ जहाँ पर एक अल्फाज़ उर्दू का है और एक शब्द हिंदी का | इस ही वजह से इसकी सभी नज्में और सभी शेर हिन्दुस्तानी भाषा में है, जो कि अपने आप में ही इस देश की एकता और अमन का प्रतीक है | शायरा का मानना है कि इंसान बाहरी तौर पर जितनी तरक्की करता जा रहा है, वह अन्दर से उतना ही खाली होता जा रहा है | कहने को तो ‘मॉडर्न’ हो गया है, लेकिन जातिवाद जैसी चीज़ें आज भी उसे अन्दर से खोखला करती जा रही हैं | मॉडर्न होने के साथ-साथ इंसान आज के लाइफ-स्टाइल की वजह से बहुत सी ज़ेहेनी बीमारियों से भी घिरता जा रहा है | आप बहुत सी नज्मों में शायरा की इस सोच को शब्दों का रूप लेते हुए पाएंगे | ‘गुलदस्ता-ए-शब्द’ एक कोशिश है, शब्दों के गुलों की ख़ुशबू को आपकी रूह तक पहुँचाने की।.

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